Thursday, 22 December 2011

दलित मुस्लिमों और ईसाइयों को अनुसूचित जाति का दर्जा मिला


दलित मुसलमानों और ईसाइयों को अनुसूचित जाति के दायरे में शामिल करने की लड़ाई दिनोदिन लंबी होती जा रही है. रंगनाथ मिश्र आयोग की रिपोर्ट को 4 साल होने को आए, लेकिन आज भी यूपीए सरकार इस रिपोर्ट की स़िफारिशों को अमल में लाने को लेकर कश्मकश में है, जबकि संसद के अंदर और बाहर दोनों ही जगहों पर सरकार पर रंगनाथ मिश्र आयोग की स़िफारिशें लागू करने का ज़बरदस्त दबाव है. हाल ही में एक बार फिर इस मांग को लेकर मुंबई स्थित कैथोलिक सेक्युलर फोरम, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिला और उनसे मांग की कि दलित मुसलमानों और ईसाइयों की सामाजिक, आर्थिक स्थिति में सुधार के लिए उन्हें जल्द से जल्द अनुसूचित जाति का दर्जा प्रदान किया जाए. प्रधानमंत्री ने प्रतिनिधिमंडल को आश्वासन दिया कि इस मसले पर जल्द ही आख़िरी फैसला लिया जाएगा. फिलव़क्त, संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश 1950 का अनुच्छेद-3 दलित मुसलमानों और ईसाइयों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने की राह में सबसे बड़ी रुकावट है. इसमें कहा गया है कि अनुसूचित जाति को यदि रिज़र्वेशन का फायदा उठाना है तो सभी दलितों को एक ख़ास मज़हब से ताल्लुक़ रखना होगा. ज़ाहिर है, यह काला क़ानून अनुच्छेद 341 (1) के प्रावधान और संविधान के तहत अवाम को दिए गए मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है. इस क़ानून को चुनौती देने वाली एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में साल 2004 से विचारधीन है, लेकिन अभी तक इस पर फैसला नहीं आ पाया है. दलित मुसलमानों और ईसाइयों को अनुसूचित जाति का दर्जा दिलाने के लिए यूपीए सरकार कितनी संजीदा है, यह इस बात से मालूम होता है कि 7 साल हो गए, लेकिन सरकार अभी तक इस मसले पर अपने विचार सुप्रीम कोर्ट में नहीं रख पाई है. इस दौरान कई सूबाई सरकारें सार्वजनिक तौर पर केंद्र में दलित मुसलमानों और ईसाइयों के अधिकारों को लागू करने की अपील कर चुकी हैं. यही नहीं मुल्क में धार्मिक एवं भाषाई अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव दूर करने के रास्तों की तलाश के लिए ख़ुद यूपीए सरकार द्वारा गठित रंगनाथ मिश्र आयोग ने भी अपनी रिपोर्ट में अल्पसंख्यकों की सामाजिक, आर्थिक हालत में सुधार का सुझाव दिया था और उन्हें अनुसूचित जाति का दर्जा दिए जाने की वकालत की थी.
1950 में हिंदुस्तान के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने अपनी उद्घोषणा द्वारा हिंदू दलितो को तो अनुसूचित जाति में शामिल कर लिया, मगर बाक़ी बचे ग़ैर हिंदू दलितों को सूची से हटा दिया. नतीजतन 85 फीसदी दलित मुसलमान इससे वंचित रह गए.
दरअसल, गेंद अब केंद्र सरकार के पाले में है और मिश्र आयोग की स़िफारिशों के बाद सरकार को ही इस मुद्दे पर अपना आख़िरी फैसला करना है. ऐसा नहीं है कि इस मसले पर पहले कोई क़दम नहीं उठाया गया, बल्कि साल 1996 में तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष व दलित नेता सीताराम केसरी की पहल पर कांग्रेस सरकार एक विधेयक, आदेश 1950 के अनुच्छेद 3 में संशोधन के लिए लोकसभा में लाई थी, लेकिन शिवराज पाटिल ने जो उस व़क्त लोकसभा स्पीकर थे, तकनीकी कमी बताकर विधेयक को रद्द कर दिया था. अब जबकि एक बार फिर केंद्र मे कांग्रेसनीत सरकार हुकूमत में है, तो उसका नैतिक उत्तरदायित्व बनता है कि वह इस विधेयक को दोबारा सदन में लाए और उस ऐतिहासिक भूल को दुरुस्त करे, जिसका ख़ामियाज़ा लंबे समय से दलित मुसलमान और ईसाई भुगत रहे हैं. उनको अनुसूचित जाति में शामिल नहीं किया जाना, एक संवैधानिक त्रुटि है और यह भारतीय संविधान की मूल भावना के ख़िला़फहै.
दरअसल, दलित मुसलमानों और ईसाइयों को अनुसूचित जाति में शामिल किए जाने की मांग उतनी ही पुरानी है, जितना 1935 का भारतीय सरकार अधिनियम. यह अधिनियम हिंदुस्तान के सभी दलितों को शिक्षा, रोज़गार और न्याय का अधिकार प्रदान करता है. लिहाज़ा, सदियों से उपेक्षित, प्रताड़ित इन तबक़ों की सामाजिक व माली हालत सुधारने के लिए शासन ने संविधान के अनुच्छेद 341 के तहत सभी दलितों को अनुसूचित जाति में शामिल किया. बहरहाल, 1950 में हिंदुस्तान के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने अपनी उद्घोषणा द्वारा हिंदू दलितो को तो अनुसूचित जाति में शामिल कर लिया, मगर बाक़ी बचे ग़ैर हिंदू दलितों को सूची से हटा दिया. नतीजतन 85 फीसदी दलित मुसलमान इससे वंचित रह गए. तब से आज तक दलित मुसलमानों को अनुसूचित जाति में शामिल किए जाने की मांग कई बार उठी, लेकिन सही प्लेटफार्म न मिलने और राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में यह मांग ख़ुद-ब-ख़ुद दम तोड़ती रही. आज़ादी से पहले जो हिंदू दलित जातियां मुसलमानों के मुक़ाबले बद से बदतर हालात में थीं, वे अनुसूचित जाति में शामिल होने के बाद आरक्षण के फायदों से बेहतर हालत में आ गईं. वहीं आज मुसलमान अनुसूचित जातियों से भी पीछे हो गए. आलम यह है कि मुसलमानों की कुल आबादी के 80 फीसदी लोग ग़रीबी रेखा से नीचे ज़िंदगी ग़ुजार रहे हैं. मुसलमानों की अधिकतम तादाद आज भी अपनी रोज़ी-रोटी के लिए छोटे-मोटे धंधों लघु उद्यमों और कम आमदनी वाली प्राइवेट नौकरियों आदि के आसरे है. सरकारी नौकरियां उनके लिए महज़ ख्वाब हैं. तालीम के अभाव में अव्वल तो वे नौकरियों के लिए परीक्षा में बैठ ही नहीं पाते हैं और अगर कहीं तालीमयाफ्ता हो भी जाएं तो कंपटीशन में दूसरोंके मुक़ाबले कहीं से भी टिक नहीं पाते. इसके कारण जो मुस्लिम समुदाय आज़ादी से पहले सरकारी नौकरियों में आला पदों पर क़ायम था, वह आहिस्ता-आहिस्ता नौकरियों से लगभग बेदख़ल हो गया. इसका जीता जागता सबूत सरकारी नौकरियों में हिंदुस्तान भर में मुसलमानों की हिस्सेदारी है, जो निम्नतर स्तरों पर भी कभी 6 फीसदी से ज़्यादा नहीं रही. वहीं हिंदू दलित जातियां जिन्हें अनुसूचित जाति में शामिल कर आरक्षण का फायदा दिया गया, आज मुसलमानों से कहीं अधिक बेहतर स्थिति में हैं.
आज ज़रूरत इस बात की है कि वह क़ौम, जिसकी 80 फीसदी से ज़्यादा जनसंख्या ग़रीबी रेखा से नीचे जी रही हो, उसकेअधिकारों की बात की जाए, जो कहीं से भी नाजायज़ नहीं है. समानता, न्याय और उन्नति की मांग मुसलमानों के संवैधानिक एवं मौलिकअधिकार हैं. 1935 के भारत सरकार अधिनियम के मुताबिक़राष्ट्रपति की 1950 की उद्घोषणा अंतरराष्ट्रीय क़ानून की नज़र में सबसे बड़ा काला क़ानून है. वास्तव में यह उद्घोषणा अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लघंन है, जिसमें क्रमश: विधि के समक्ष समता तथा धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर विभेद के प्रतिरोध की बात कही गई है. दलित मुसलमानों और ईसाइयों को भी अनुसूचित जाति में शामिल कर आरक्षण देना क़ानूनन तर्कसंगत है. हिंदू-मुस्लिम, हिंदू-ईसाई के चश्मे से परे इन समुदायों की मांग को हिंदुस्तानी क़ौम की तरक्क़ी से जोड़कर देखना ज़्यादा मुनासिब होगा. दलित मुसलमान और ईसाई अनुसूचित जाति के अधिकारों की मांग के लिए मुल्क में गुज़िश्ता 64 सालों से संघर्ष कर रहे हैं. अब व़क्त आ गया है कि उनकी मांग पर संजीदगी से विचार हो और उन्हें जल्द से जल्द अनुसूचित जाति का दर्जा दिया जाए.

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ऐसे बनेगी मुसलमानों की तकदीर


अमेरिका स्थित पिऊ रिसर्च सेंटर की हाल में आई एक रिपोर्ट के अनुसार, पूरे विश्व में एक बिलियन और 570 मिलियन मुसलमान हैं. मतलब दुनिया का हर चौथा आदमी मुसलमान है. क्या इस रिपोर्ट में कुछ ऐसा है, जिस पर खुश हुआ जा सके? मेरे हिसाब से तो नहीं. अलबत्ता मुसलमानों के लिए यह एक विचारणीय बात है और उन्हें इस पर चिंतन करना चाहिए. दुनिया की चौथाई आबादी होने के बाद भी आज मुसलमान वैज्ञानिक-तकनीकी तौर पर पिछड़े हैं, राजनीतिक रूप से भी हाशिये पर हैं और आर्थिक रूप से बहुत ग़रीब. ऐसा क्यों है? विश्व के सकल घरेलू उत्पाद, जो 60 ट्रिलियन डॉलर है, में मुसलमानों की भागीदारी केवल 3 ट्रिलियन डॉलर है, जो फ्रांस जैसे छोटे देश, जिसकी जनसंख्या 70 मिलियन है, से भी कम है और जापान के सकल घरेलू उत्पाद की आधी है तथा अमेरिका, जिसकी जनसंख्या 300 मिलियन है, के सकल घरेलू उत्पाद का पांचवां हिस्सा है. ऐसा क्यों है? यह एक आश्चर्यजनक तथ्य है कि विश्व की 35 फ़ीसदी जनसंख्या ईसाई है, लेकिन यही 35 फ़ीसदी लोग विश्व की 70 फ़ीसदी धन-संपत्ति के मालिक हैं.
दुनिया की चौथाई आबादी होने के बाद भी आज मुसलमान वैज्ञानिक-तकनीकी तौर पर पिछड़े हैं, राजनीतिक रूप से भी हाशिये पर हैं और आर्थिक रूप से बहुत ग़रीब. ऐसा क्यों है? विश्व के सकल घरेलू उत्पाद, जो 60 ट्रिलियन डॉलर है, में मुसलमानों की भागीदारी केवल 3 ट्रिलियन डॉलर है, जो फ्रांस जैसे छोटे देश, जिसकी जनसंख्या 70 मिलियन है, से भी कम है और जापान के सकल घरेलू उत्पाद की आधी है तथा अमेरिका, जिसकी जनसंख्या 300 मिलियन है, के सकल घरेलू उत्पाद का पांचवां हिस्सा है. ऐसा क्यों है?
मानव विकास सूचकांक यानी एचडीआई में भी यदि कुछ तेल निर्यात करने वाले देशों को छोड़ दिया जाए तो बाक़ी सभी मुसलमान देश बहुत नीचे आते हैं. विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी मुसलमान देश बहुत पीछे हैं. विज्ञान के क्षेत्र में बस पांच सौ शोध प्रबंध यानी पीएचडी जमा होते हैं. यह संख्या अकेले इंग्लैंड में तीन हज़ार है. 1901 से लेकर 2008 तक लगभग पांच सौ नोबल पुरस्कारों में से यहूदियों को 140 बार यह पुरस्कार पाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, जो लगभग 25 फ़ीसदी है, जबकि यहूदियों कि जनसंख्या विश्व की जनसंख्या की केवल 0.2 फ़ीसदी है. इसके विपरीत आज तक मात्र एक मुसलमान को यह पुरस्कार पाने का अवसर मिला है. (एक और भी था, लेकिन पाकिस्तान ने उसे ग़ैर मुसलमान घोषित कर दिया) मतलब यह कि मुसलमानों की इस पुरस्कार में भागीदारी 0.2 फ़ीसदी है. यानी विज्ञान के क्षेत्र में मुसलमानों का योगदान नगण्य है. एक और नकारात्मक तथ्य निकल कर आया शंघाई विश्वविद्यालय द्वारा तैयार की गई एक रिपोर्ट के आधार पर. इसमें विश्व के चार सौ सबसे बढ़िया विश्वविद्यालयों की एक सूची है और इस्लामी देशों का एक भी विश्वविद्यालय इस सूची में नहीं है. यह बड़ी दु:खद बात है, क्योंकि सातवीं शताब्दी से लेकर सोलहवीं शताब्दी तक दुनिया के सबसे बड़े और आलिम विश्वविद्यालय मुस्लिम देशों में स्थित थे. कोरडोबा, बग़दाद और काइरो इस्लामिक तालीम के नामचीन केंद्र थे.
विज्ञान के जाने-माने इतिहासकार जिलेस्पी ने ऐसे 130 महान वैज्ञानिकों एवं और प्रौद्योगिक विशेषज्ञों की सूची बनाई है, जिनका मध्य युग में बहुत बड़ा योगदान था. इनमें से 120 ऐसे थे, जो मुसलमान देशों से थे और केवल चार यूरोप से थे. क्या यह तथ्य खुद में इतना अर्थपूर्ण नहीं कि मुसलमान अपने भूत को विवेचित करें, अपने आज को ईमानदारी से देखें और अपने भविष्य की तार्किक रूप से कल्पना करें. मैं मुसलमानों की इस आबादी के बारे में कुछ और रोचक तथ्य बता सकता हूं, जो अलग-अलग संस्थाओं द्वारा किए गए शोधों पर आधारित हैं. आज की प्रजनन रफ़्तार से मुसलमानों की जनसंख्या अगले 500 सालों में दोगुनी हो जाएगी. तब मुसलमान संख्या में ईसाइयों से अधिक हो जाएंगे, जिनकी जनसंख्या भी दोगुनी होगी. मतलब यह कि मुसलमानों की समस्याएं और बढ़ जाएंगी. आज की बेरोज़गारी और आर्थिक ग़रीबी, जो मुस्लिम समाज और मुस्लिम देशों में व्याप्त है, वह ज़ाहिर तौर पर और बढ़ेगी. अगले पचास सालों में अगर मुस्लिम जनसंख्या बढ़कर दोगुनी हो गई तो मुसलमान और ईसाई देशों के बीच आर्थिक विकास की दूरी और बढ़ेगी. प्रश्न फिर यह उठता है कि इस शताब्दी या आने वाली सदी में विश्व पर किसकी सार्वभौमिकता और प्रभुसत्ता रहेगी, पांच फीसदी संसाधन वाले मुसलमानों की या 70 फीसदी संसाधन वाले ईसाइयों की?
मुसलमानों को यह याद रखने की ज़रूरत है कि आज के वैज्ञानिक विकास से परिभाषित विश्व में किसी भी देश की इज़्ज़त और शक्ति उसकी जनसंख्या पर आधारित नहीं है. आज के विश्व में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विकास ही शक्ति, इज़्ज़त और संसाधनों की गारंटी है. ऐसे कई उदाहरण हैं, जहां अधिक जनसंख्या के साथ आर्थिक पिछड़ापन और कम सामरिक सामर्थ्य है. यहूदी देश इजराइल को देखिए, इतना छोटा देश पूरे अरब पर हावी रहता है. ऐसा इसलिए है, क्योंकि यह एक आर्थिक, सामरिक और वैज्ञानिक रूप से समृद्ध देश है, जिसके सामने पिछड़ेपन के शिकार अरब देशों को झुकना पड़ता है, हार मान लेनी पड़ती है. एक तरफ वे मुसलमान हैं, जो आज पश्चिमी देशों में रहते हैं और अपनी समृद्धि से खुश हैं. जबकि वहीं वे मुसलमान भी हैं, जो मुस्लिम बाहुल्य देशों के वाशिंदे हैं और आर्थिक रूप से पिछड़ेपन में डूबे हुए हैं. यूरोप में रहने वाले 20 मिलियन मुसलमानों का सकल घरेलू उत्पाद पूरे भारतीय महाद्वीप के 500 मिलियन मुसलमानों से अधिक है.
निस्सीम हसन एक ख्याति प्राप्त इस्लामिक विद्वान हैं. वह कहते हैं कि मुसलमानों में ज्ञानार्जन की घटती प्रवृत्ति ही उनके आर्थिक और राजनीतिक पतन का मुख्य कारण है. हमने सदियों से मानवता का नेतृत्व छोड़ दिया है. हम लकीर के फ़कीर बनकर रह गए हैं. महातिर मोहम्मद, जो मलेशिया के पूर्व प्रधानमंत्री हैं, ने मुसलमानों को सही सलाह दी. उन्होंने ओआईसी की मीटिंग में कहा कि मुसलमानों को अपनी रूढ़िवादिता छोड़कर नए समय में नई पहचान बनानी चाहिए, क्योंकि सामाजिक परिस्थितियां अब बदल चुकी हैं. यह याद रखने की बात है कि आठवीं से चौदहवीं शताब्दी के बीच जब मुसलमान स्पेन पर राज करते थे, तब स्पेन की आमदनी बाक़ी सारे यूरोप से अधिक थी. ऐसा इसलिए था, क्योंकि स्पेन तब उच्च शिक्षा का बहुत बड़ा केंद्र हुआ करता था. आज स्थिति उलट-पुलट हो गई है. आज ईसाई स्पेन का सकल घरेलू उत्पादन विश्व के बारह तेल निर्यात करने वाले मुस्लिम देशों से कहीं अधिक है. मुस्लिम शासन के दौरान सभी देशों का इतना ही अच्छा हाल था. बग़दाद, डमास्कस, काहिरा एवं त्रिपोली अपनी वैज्ञानिक दूरदृष्टि के लिए विख्यात थे. इन मध्ययुगीन शताब्दियों में मुस्लिम देशों को आर्थिक, सांस्कृतिक एवं बौद्धिक रूप से बहुत विकसित माना जाता था. इसके विपरीत डोनाल्ड कैम्बेल (सर्जन-फ्रांस) के अनुसार, जब मुस्लिम देशों में विज्ञान की आंधी चल रही थी, तब यूरोप अंधकार में जी रहा था. जब इस्लाम का उद्भव हो रहा था और वह संसार पर हावी हो रहा था, तब मुसलमानों की जनसंख्या बमुश्किल 10 फीसदी थी.
मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने कहा था कि यह सारी स्थिति सोलहवीं शताब्दी से बदलने लगी. इस समय मुस्लिम समाज निष्क्रिय हो गया और यूरोपीय अंधकार को अपनाने लगा. वहीं दूसरी ओर ईसाई जनता मुस्लिम विज्ञान की ओर उन्मुख हो रही थी. ऐसे में वही हुआ, जिसका डर था. वह मुसलमान समाज, जिसने पूरी दुनिया को आठ सौ सालों तक अपना मुरीद बनाए रखा, उभरते हुए यूरोप के सामने झुक गया. इस संदर्भ में मौलाना अबुल हसन अली नदवी, जो एक बहुत बड़े इस्लामविद्‌ थे, का कथन बहुत प्रासंगिक है कि सोलहवीं शताब्दी के बाद मुसलमानों ने तर्क और विज्ञान को छोड़ दिया. इसलिए इस समाज में कोई महान व्यक्तित्व नहीं उभर पाया और मुसलमान अपनी परंपरागत जीवनशैली में बंधकर रह गए. कुछ समय पहले सैमुअल हंटिंग्टन ने पश्चिम और मुस्लिम देशों के बीच के विवाद को दो सभ्यताओं का विवाद कहा था. यह बिल्कुल ग़लत बात है. यह विवाद अमीर और ग़रीब देशों का है, अमीर मनमानी करना चाहते हैं और ग़रीब पिस रहे हैं.
दुनिया के ग़रीब देशों को समझ लेना चाहिए कि अमीर देशों से बिन बात के झगड़ों से उनकी ही हानि होगी और वह भी तब, जब यह झगड़ा धर्म के नाम पर हो. ग़रीब देशों (मुस्लिम या ग़ैर मुस्लिम) की भलाई विश्व शांति में ही अधिक है. मुस्लिम समाज की भलाई का एक ही रास्ता है कि वह यूरोप के पुनर्जागरण जैसे वैज्ञानिक रास्ते पर चले और वह भी आज के यूरोप से तेज़ रफ़्तार में. सबसे पहले मुसलमानों को अपने मन से कट्टरपंथ और चरमपंथ को उखाड़ फेंकना होगा और सच्चे इस्लाम के तहत भाईचारे और सहिष्णुता को अपनाना होगा. पश्चिम के विरोध और पश्चिमी देशों के वीसा और ग्रीन कार्ड हासिल करने की जद्दोजहद में बहुत बड़ा विरोधाभास है. कुछ अरब देशों के शासकों की सराहना करनी होगी, क्योंकि हाल में उन्होंने विश्व के धर्मों में आपसी तालमेल को बढ़ावा देने के लिए जो क़दम उठाए हैं, वे निश्चय ही दूरगामी हैं. एक कांफ्रेंस के दौरान सऊदी अरब के राजा अब्दुल्लाह ने कहा कि इस्लाम को चरमपंथ से दूर रहना होगा. कुछ मुसलमानों ने कट्टरपंथ की आड़ में सच्चे इस्लाम पर बट्टा लगाया है. हमें पूरी दुनिया को बताना होगा कि इस्लाम मानवता की आवाज़ है, सहिष्णुता की पुकार है और मेलजोल का हिमायती.

(लेखक एनबीआरआई के अवकाशप्राप्‍त वैज्ञानिक हैं)

एक अंग्रेज की ईमानदार स्वीकारोक्ति


इंग्लैण्ड के प्रसिद्ध मानवाधिकार कार्यकर्ता  लार्ड  एंथनी   लेस्टर ने सवा सौ करोड़ भारतीयों को अवसर प्रदान किया है कि वे देश के नकाबपोश कर्णधारों से सीधे सवाल करें...
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
जहाँ  तक मुझे याद है,मैं 1977से एक बात को बड़े-बड़े नेताओं से सुनता आ रहा हूँ.नेता कहते हैं   भारतीय कानूनों में अंग्रेजी की मानसिकता छुपी हुई है,इसलिये इनमें आमूलचूल परिवर्तन की जरूरत है,लेकिन परिवर्तन कोई नहीं करता है.
चौधरी चरण सिंह से लेकर मोरारजी देसाई, जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, चन्द्र शेखर, विश्‍वनाथ प्रताप सिंह, मुलायम सिंह, लालू यादव, रामविलास पासवान और मायावती तक सभी दलों के राजनेता सत्ताधारी पार्टी या अपने प्रतिद्वन्दी राजनेताओं को सत्ता से बेदखल करने या खुद सत्ता प्राप्त करने के लिये आम चुनावों के दौरान भारतीय कानूनों को केवल बदलने ही नहीं,बल्कि उनमें आमूलचूल परिवर्तन करने की बातें करते रहे हैं. लेकिन इनमें से जो-जो भी, जब-जब भी सत्ता में आये, सत्ता में आने के बाद वे भूल ही गये कि उन्होंने भारत के कानूनों को बदलने की बात भी जनता से कही थी
अब आजादी के छ: दशक बाद एक अंग्रेज ईमानदारी दिखाता है और भारत में आकर भारतीय मीडिया के मार्फत भारतीयों से कहता है कि भारतीय दण्ड संहिता में अनेक प्रावधान अंग्रेजों ने अपने तत्कालीन स्वार्थ साधन के लिये बनाये थे, लेकिन वे आज भी ज्यों की त्यों भारतीय दण्ड संहिता में विद्यमान हैं, जिन्हें देखकर आश्‍चर्य होता है
इंग्लैण्ड  के लार्ड एंथनी लेस्टर ने कॉमनवेल्थ लॉ कांफ्रेंस के अवसर पर स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारतीय दण्ड संहिता के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के लिये पर्याप्त और उचित संरक्षक प्रावधान नहीं हैं .  केवल इतना ही नहीं, बल्कि लार्ड एंथनी लेस्टर ने यह भी साफ शब्दों में स्वीकार किया कि भारतीय दण्ड संहिता में अनेक प्रावधान चर्च के प्रभाव वाले इंग्लैंड के तत्कालीन मध्यकालीन कानूनों पर भी आधारित है,जो बहु आयामी संस्कृति वाले भारतीय समाज की जरूरतों से कतई भी मेल नहीं खाते हैं, फिर भी भारत में लागू हैं
भारतीय प्रिंट  एवं इलेक्ट्रानिक   मीडिया अनेक बेसिपैर की बातों पर तो खूब हो-हल्ला मचाता है,लेकिन इंग्लैण्ड के लार्ड एंथनी लेस्टर की उक्त महत्वूपर्ण स्वीकारोक्ति एवं भारतीय दण्ड संहिता की विसंगतियों के बारे में खुलकर बात कहने को कोई महत्व नहीं दिया जाना किस बात का संकेत है?
इससे हमें यह सोचने को विवश होना पड़ता है कि मीडिया भी भारतीय राजनीति और राजनेताओं की अवसरवादी सोच से प्रभावित है जो चुनावों के बाद अपनी बातों को पूरी तरह से भूल जाता है लगता है कि मीडिया भी जन सरोकारों से पूरी तरह से दूर हो चुका है.

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